गांधी जी के कार्यक्रमों में सार्वजनिक सहभागिता कम होती जा रही है — रामबिलास प्रजापति


देवरिया — मैंने कभी यह कल्पना भी नहीं किया था कि गांधीजी का जन्मदिवस उनकी मृत्यु के ७३ वर्ष बाद मात्र औपचारिकता ही रह जायेगी।मैं देख रहा हूं कि गांधी जी की शिक्षाओं के प्रति लोगों का उत्साह कम होता जा रहा है तथा उनके नाम से जुड़े कार्यक्रमों में सार्वजनिक सहभागिता कम होती जा रही है।
एक इंसान जिसने देश की स्वतंत्रता और इसे गौरव प्रदान कराया उनके अनुयाई अब मुट्ठी भर रह गये है और उनकी संख्या दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है।जिस वर्धा से इन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन छेड़ा था वह विस्मृत सा होता जा रहा है । वहां जो लोग जाते भी हैं तो उनके अन्दर वर्धा की उस पवित्र भूमि के प्रति उतनी उत्कण्ठा नहीं दिखाई देती है । भाजपा विचारधारा के लिहाज से गांधी जी कि विचार धारा की बिरोधी रही है। केन्द्र में सरकार होने के बाद भी गांधी जी के प्रति उपेक्षात्मक रवैया अपनायी जा रही है और कयी कार्यालयों, सार्वजनिक स्थानों से गांधी जी की मूर्तियां हटाती जा रही है तथा उनके स्थान पर भाजपा नेताओं मंत्रियों के कमरों में श्यामा प्रसाद मुखर्जी,अटल की मूर्तियां लगायी जा रही है और इनके द्वारा गांधी जी के प्रति मात्र मौखिक सहानुभूति ब्यक्त की जा रही है ।संघ परिवार की देवमाला में शिवाजी और महाराणा प्रताप शामिल हैं किन्तु महात्मा गांधी को कोई जगह नहीं है शायद ये भी जाति वाद के शिकार हो रहे हैं ।संघ के नागपुर के कार्यालय में भी गांधी जी की मूर्ति नहीं है। भाजपा की नजर में शायद गांधी जी देशविरोधी तत्व है यहां तक कि एक हिन्दू उन्मादी ब्यक्ति द्वारा गांधी जी की हत्या भी कर दी गयी। गांधी का दोष मात्र यही था कि वे देश का बंटवारा नहीं चाहते थे और उन्होंने हिन्दू मुस्लिम भाई भाई का नारा दे दिया जो हिन्दू राष्ट्र की कल्पना करने वालों के खिलाफ था ।आज उसी हत्यारे को गौरवान्वित किया जा रहा है जो अति निंदनीय है। हिन्दू राष्ट्र आर एस एस की अवधारणा है,यह भाजपा की उद्घघोषणा है किन्तु गांधी जी इस उद्घघोषणा और अवधारणा के बिरोधी थे । उन्होंने कभी धर्म आधारित राज्य का समर्थन नहीं किया ।
उन्होंने अपने द्वारा सम्पादित साप्ताहिक पत्रिका” हरिजन”में २२ सितम्बर १९४६ को लिखा था कि राज्य जनता के कल्याण,सुख,सुबिधा, स्वास्थ्य,संचार और विदेशी मामलों केलिये है ।यह किसी धर्म का नहीं है। गांधी जी की हमेशा यह राय रही कि धर्म राष्ट्रीयता का आधार नहीं हो सकता है। उन्होंने एक बार जिन्ना से कहा था कि यदि कोई व्यक्ति दूसरा मज़हब अपना लेता हैं तो वह अलग राष्ट्र का सदस्य नहीं हो सकता है ।सभी धर्मों में कट्टपंथी है जो देश में भाईचारा बिगाड़ने का काम कर रहे हैं ।आज हमें भाईचारा बनाने की आवश्यकता है अन्यथा ये धार्मिक कट्टर लोग तो देश को खण्डित करने में लगे हैं । शहरी क्षेत्रों में आज उपभोक्ता वादी विद्रुप संस्कृति पसरती जा रही है और लोग सादगी को कमजोरी समझने लगे हैं।उनकी सोच गांधी जी की सोच के अनुरूप नहीं है।
गांधी जी ने वर्तमान भारत की कल्पना नहीं की थी वे चाहते थे कि अमीरी और गरीबी की खायी भी कम हो और सभी भारतीय मिलजुलकर रहें किन्तु आज यह खायी बड़ी तेजी से बढ़ रही है। इसका कारण सरकार की नीतियां हैं । पूंजी का केन्द्रीय करण होता जा रहा है जो अगली पीढ़ियों के लिए अत्यंत घातक होगा । उन्होंने देश की आजादी के लिए अहिंसा और सत्याग्रह का मार्ग अपनाया उनके अनुसार अहिंसा के माध्यम से असत्य पर आधारित बुराई का बिरोध करना ही सत्याग्रह है। उन्होंने सत्याग्रह को हथियार बनाया और दुनिया की सबसे बड़ी ताकत ब्रिटिश हुकूमत को मजबूर कर दिया कि वह भारत को आजाद कर दे ।उनका कहना था कि असत्य को सत्य से और बुराई को भलाई से जीता जा सकता है अहिंसा के मार्ग पर चलकर सत्याग्रह द्वारा आज भी हम बड़ी से बड़ी लड़ाई जीत सकते हैं । गांधी जी का अहिंसा और सत्याग्रह का हथियार आज भी प्रासंगिक हैं ।
लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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