सुप्रीम कोर्ट ने जबरन ईसाई बनाने का केस किया खारिज, ईसाई बंधुओं को मिली राहत

नेशनल न्यूज़ टाइम (मध्य प्रदेश) मध्यप्रदेश में जबरन धर्मांतरण कराने के एक आरोपी को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी राहत दे दी। शीर्ष अदालत ने आरोपी के खिलाफ दर्ज आपराधिक केस खारिज कर दिया। कोर्ट ने पाया कि जिस व्यक्ति के बलात् धर्मांतरण का यह केस था, उसने इस बात को गलत बताया कि उसे जबर्दस्ती ईसाई बनाया गया था।

जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस एस. रवींद्र भट व जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने मप्र हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें आरोपी जॉर्ज मंगलपिल्ली को कोई राहत देने से इनकार कर दिया गया था। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि गवाह के बयान के अलावा इस केस में कुछ भी ठोस नहीं है, जिस पर आरोपी के खिलाफ सबूत के तौर पर भरोसा किया जा सके।

पीठ ने कहा कि केस के सबूतों व परिस्थितियों को देखते हुए उस व्यक्ति का बयान महत्वपूर्ण है, जिसके जबरन धर्मांतरण का आरोप लगाया गया है। कोर्ट की राय में कथित तौर पर जबरन धर्मांतरित किए गए व्यक्ति की गवाही महत्वपूर्ण है। उसका खुद का कहना है कि उसका न तो जबरन धर्मांतरण किया गया और न ही उससे अपीलकर्ता जॉर्ज मंगलपिल्ली ने कभी संपर्क किया।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता को मांगी गई राहत प्रदान कर दी और अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का आदेश खारिज कर दिया। इसके साथ ही आरोपी जॉर्ज मंगलपिल्ली के खिलाफ मप्र धार्मिक स्वतंत्रता कानून 1968 की धारा 3 व 4 के तहत दर्ज केस खारिज कर दिया।

अभियोजन के अनुसार आरोपी ने कथित तौर पर धर्मेंद्र दोहर का धर्म परिवर्तन कराकर ईसाई बनाया था। यह धार्मिक स्वतंत्रता कानून की धारा 3 के तहत अपराध है। निचली कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान दोहरे ने कहा था कि आरोपी ने उसका धर्मांतरण नहीं कराया है। कुछ लोगों ने उससे कागज पर दस्तखत करा लिए थे, जिसके आधार पर आरोपी के खिलाफ केस दर्ज किया गया था।

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