अमर गायक मोहम्मद रफ़ी,31 जुलाई पुण्यतिथि पर विशेष;

पंचकुला-चंडीगढ़: एचएनआर : मिलना और बिछड़ना जीवन की रीत है ओर कुछ लोग कभी ना मिलने के लिए बिछड़ जाते है और पीछे छोड़ जाते है यादों के अनवरत सिलसिले। मोहम्मद रफ़ी भी एक ऐसी शख़्सियत का नाम है जिन्हें हम से बिछड़े हुए 41 वर्ष हो गये परंतु आज भी उनके चाहने वालों ,दीवानों में कोई कमी नहीं आयी । आवाज़ का यह जादूगर 31 जुलाई 1980 को सदा के लिये ख़ामोश हो गया और पीछे छोड़ गये अपने गाये हुए हज़ारों नग़मे ,गीत ,ग़ज़ल ,भजन , देश भक्ति गीत, क़व्वाली जो आज भी अपने आप में एक रिकार्ड है।
24 दिसंबर 1924 को पंजाब के कोटला सुल्तान गाँव में जन्मे मोहम्मद रफ़ी को बचपन से ही गाने का शौक़ था। रफ़ी साहब ने अपने समय के हर कलाकार , हर संगीतकार के लिये गाया । उनकी आवाज़ में ऐसा जादू था कि वह जैसा चाहते वैसा ढाल लेते अपने आवाज़ को वो किसी भी बुलंदी तक खींच सकते थे।जब भी उनके गीत कानों में पड़ते हैं तो लगता है किसी ने चाशनी घोल दी।
रफ़ी साहब का विचार था कि कोई गीतकार या संगीतकार छोटा या बड़ा नहीं होता, सबका अपना व्यक्तित्व होता है और संगीत का तो अपने आप में एक व्यक्तित्व है।

हर प्रकार के गीतों में महारत हासिल होने के कारण उन्होंने हरेक कलाकार के लिए गाया ।गीतकारों की लेखनी से निकले शब्दों को रफ़ी साहब ने अपने स्वर में ऐसा पिरोया कि सब झूम उठे। शुद्ध भारतीय संगीत हो या पश्चिमी संगीत उन्हें हर गीत में महारत हासिल थी। उन्होंने लगभग सभी भारतीय भाषाओं में गीत रिकार्ड किये।

सर्वोत्तम गायक होने के साथ साथ रफ़ी साहब एक बहुत ही नेक दिल मिलनसार, व सज़्ज़न प्रकृति के इंसान थे। बहुत कम बोलते थे ,ना किसी नशे का, ना धन का लालच ।अनेक नए संगीतकारों के लिए उन्होंने मुफ़्त गीत गए और 31 जुलाई 1980 को गायक मोहम्मद रफ़ी की संजीव व सुरीली आवाज़ हमेशा हमेशा के लिए ख़ामोश हो गई।

लगभग चार दशकों तक रफ़ी साहब अपनी आवाज़ का इंद्र्धनुष बिखेरते रहे ‘मधुबन में राधिका नाचे रे ‘गाने वाला गायक और कहाँ ‘याहू ‘जैसे गीत –इतनी तेज लय एवं आवाज़ का तालमेल , आजतक कोई गायक यहाँ तक नहीं पहुँच पाया । ‘सुख के सब साथी दुःख में ना कोई’ भजन रफ़ी साहब के आवाज़ में जब सुनते हैं तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है आज के गायकों के लिये वो एक विश्वविधालय है । तभी आज इतने सालों के बाद भी उनके दीवानों , चाहने वालों में कमी नहीं आयी सच तो यह है कि रफ़ी साहब मर कर भी अमर हैं।

31 जुलाई 1980 को जाते जाते मानो वो कह रहे हो –जाता हूँ मैं मुझे अब ना बुलाना,
तुम मुझे यूँ भुला ना पायोगे
रफ़ी साहब ने कई बरस पहले गया था—

ये ज़िंदगी के मैले
दुनियाँ में कम ना होंगे
अफ़सोस हम ना होंगे

मोनिका कटारिया(मीनू)
7837131996
#906/25
पंचकुला(हरियाणा)

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