नई शिक्षा नीति विद्यार्थियों को तैयार करने वाली शिक्षा पद्धति है-प्रो सलूजा

यहराष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 है पहली शिक्षा नीति है जिसका लक्ष्य है हमारे देश के विकास के लिये अनिवार्य आवश्यकताओं को पूर्ण करना है।यह नीति भारत की परम्परा और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार को बनाये रखे।

उक्त विचार बतौर मुख्यअतिथि/मुख्य वक्ता देश के सुप्रसिद्ध शिक्षाविद,विचारक और निदेशक संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान,नईदिल्ली के प्रो चांद किरण सलूजा ने आज सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी के पाणिनी भवन सभागार में पूर्वांह 11:00 बजे नई शिक्षा नीति-2020 क्रियान्वयन हेतु आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला में व्यक्त किये।

निदेशक प्रो चांद किरण ने कहा कि नई शिक्षा नीति में विद्यार्थियों को तैयार करने वाली शिक्षा पद्धति है तथा हमारी परम्परा भाष्य परम्परा है।प्रत्येक बच्चे की विशिष्ट क्षमताओं की पहचान और विकास हेतु प्रयास करना ही नई शिक्षा नीति का भाव है।शिक्षा के विकास में मनोविज्ञान का समावेश हो।

प्रो सलूजा ने कहा कि इसमें शिक्षकों और अभिभावकों को इन क्षमताओं के प्रति संवेदनशील बनना होगा जिससे वे बच्चों की अकादमिक और अन्य क्षमताओं का सर्वांगीण विकास पर भी ध्यान दे सकें।

प्रसिद्ध शिक्षाविद प्रो सलूजा ने शिक्षा के मूल उद्देश्यों एवं सिद्धांत के अन्तर्गत बल देते हुये कहा कि ज्ञान हेतु शिक्षा,करने हेतु शिक्षा,परस्पर मिलकर रहने की शिक्षा या परस्पर वार्तालाप एवं मनुष्य बनने हेतु शिक्षा को प्राप्त करना है।

लचीलापन हो ताकि विद्यार्थियों में उसे सीखने की पद्धति विकसित हो एवं कार्यक्रमों को चुनने की क्षमता हो,और इस प्रकार वे अपनी प्रतिभा और रुचियों के अनुसार जीवन मे अपना सही मार्ग चुन सकेंगे।

शिक्षाविद प्रो सलूजा ने कहा कि इसमें सहानुभूति,दूसरों के सम्मान,स्वच्छता,शिष्टाचार,लोकतांत्रिक भावना,सेवा की भावना,सार्वजनिक सम्पत्ति के लिये सम्मान वैज्ञानिक चिन्तन,स्वतंत्रता ,उत्तरदायित्त्व,बहुलतावाद,समानता और न्याय जैसे नैतिकता,मानवीय संवैधानिक मूल्यों का विकास करना है।

प्रो चांद किरण ने कहा कि संस्कृत में अनमोल ज्ञान तत्व छिपे हैं उन्ही को आधुनिक विषयों के साथ परस्पर समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता है।

अध्यक्षता करते हुये विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो हरेराम त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा को आगे बढ़ाना है जिसमे प्राच्य और आधुनिक विषयों का समन्वय स्थापित कर नई शिक्षा नीति के मूल भाव को पूर्ण किया जा सकता है।संस्कृत शास्त्रों के जो विद्वान संगणक या विज्ञान जानते हैं वे सभी अपने- अपने शास्त्रों के परस्पर समन्वय स्थापित करके इसके दिव्य ज्ञान राशि को आगे बढाकर संस्कृत के मूल ज्ञान राशि के तत्व से विश्व फलक पर स्थापित हो सकते हैं।

कुलपति प्रो हरेराम त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा को आगे बढाने के लिये संस्कृत को सरलीकरण करने से इसके तत्व को आमजन तक पहुँचाया जा सकता है।यही नई शिक्षा नीति की मूल भाव है।

कुलपति प्रो त्रिपाठी ने कहा कि संस्कृत मे व्याकरण संगणक के लिये उपयोगी है इसके वैज्ञानिक दृष्टि पर बल देने आवश्यकता है।

संचालन एवं संयोजक प्रो हरिशंकर पान्डेय,वाचिक स्वागत एवं विषय परिवर्तन प्रो राम किशोर त्रिपाठी तथा धन्यवाद डॉ राजा पाठक ने किया।

उक्त कार्यशाला का प्रारम्भ मे डॉ विजय शर्मा ने वैदिक मंगलाचरण,शंखनाद से प्रारम्भ हुआ।मंचस्थ अतिथियों ने दीप प्रज्वलन,माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण तथा (मंचस्थ अतिथियों)मुख्य अतिथि एवं वक्ता तथा अध्यक्षता कर रहे कुलपति का स्वागत माला,अँगवस्त्रम एवं स्मृति चिन्ह देकर किया गया।

उस दौरान प्रो रामपूजन पान्डेय,प्रो रामकिशोर त्रिपाठी,प्रो प्रेम नारायण प्रो जितेन्द्र कुमार,प्रो सुधाकर मिश्र,प्रो महेंद्र पान्डेय,प्रो कमलकांत,प्रो विधु द्विवेदी,प्रो अमित शुक्ल,प्रो ब्रजभूषण ओझा,विजय कुमार मणि त्रिपाठी,डॉ विजय कुमार पान्डेय,डॉ मधुसूदन मिश्र,डॉ सत्येन्द्र कुमार यादव,मोहित मिश्र आदि उपस्थित थे।

अजय कुमार उपाध्याय

ब्यूरो चीफ

वाराणसी

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