उत्पीड़न और भयादोहन कर लेखनी के साथ अन्याय करते चाटुकार आखिर कैसे बन जाते हैं पत्रकार

मथुरा – लोकतंत्र में संविधान के चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकार को जाना जाता है । एक पत्रकार की अहमियत क्या होती है ? उन पीड़ितों से पूछो जिन की परेशानी प्रशासनिक स्तर तक बगैर जात-पात, धर्म पूछे एक पत्रकार ने पहुंचाई है । लेकिन बदलते समय के अनुसार आम जनता और प्रशासन के बीच सेतु की यह कड़ी धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है इसकी प्रमुख वजह निकल कर आई है वह है अब ऐसे पत्रकार बनने लगे हैं , जिनके पास किसी प्रकार का कोई अनुभव ही नहीं है । न हीं कोई डिग्री डिप्लोमा है । ऐसे व्यक्ति प्रायः पत्रकारिता में इसलिए आते हैं कि समाज में उनकी पत्रकार की इमेज बने जिसके जरिए वह रोब डालने वाला बन सके।

यह दुख का विषय है कि पत्रकारिता के क्षेत्र में भी कुछ ऐसे लोग प्रवेश कर गये हैं – जिनका खोजी पत्रकारिता से दूर दूर का भी संबंध नही है, उन्हें ना तो लोकतंत्र की परिभाषा ज्ञात है और ना ही धर्म की परिभाषा का ज्ञान है। वह उत्पीडऩ और भयादोहन कर लेखनी के साथ अन्याय करते हैं और समाज पर लेखनी का आतंक स्थापित करते हैं। ऐसी प्रवृत्ति निश्चय ही भयावह है। ऐसे पत्रकार पत्रकाारिता जगत को कलंकित करते हैं। आजकल दलाली का भी चलन चल गया है। राजनेताओं के तलवे चाटकर आमजनता का शोषण करने वाले ऐसे पत्रकार चाटुकार ही कहे जाएंगे।

मैं पत्रकार हूं ! मैं ऐसा कर सकता हूं ! मैं आपका यह  अहित कर सकता हूं वह हित कर सकता हूं। आज के ऐसे नौसखिए पत्रकार ऐसे शब्दों के साथ अपनी पत्रकारिता कर रहे हैं । लेकिन ऐसी सोच रखने वाले पत्रकार अपने आप को ज्यादा लंबे समय तक सामाजिक सरोकार निभाने वाले इस क्षेत्र में नहीं रख पाएंगे क्योंकि आज की जनता जागरूक हो गई है उसके पास भी सोशल मीडिया की पावर है वह आपको अच्छी तरह है सबक सिखाने वाली हो गई है । ऐसे पत्रकारों की भी अब कोई खैर नहीं है, इसीलिए हम आए दिन देखते हैं की पत्रकार कि यहां पिटाई हुई वहां कुटाई हुई । आखिरकार ऐसे पत्रकारों के दिन जल्दी ही लद जाएंगे और कईयों के तो लद चुके हैं।इन नौसखिए पत्रकार की वजह से ऐसे पत्रकार जो वास्तविकता में ही पत्रकारिता कर रहे हैं उन पर भी लोगों की हेय दृष्टि बनी हुई है । क्योंकि सच्ची पत्रकारिता करने वाले हमारे पत्रकारिता जगत में बहुत कम पत्रकार बचे है । कई ऐसे पत्रकार बन चुके हैं जिनको पत्रकारिता का कुछ भी  अनुभव नहीं है लेकिन वे थोड़े से सिक्योरिटी डिपॉजिट के नाम पर कुछ रुपए देखकर आज वो बड़े जिला प्रभारी बन चुके हैं इसका प्रमुख बड़ा कारण है ऐसे संस्थान है जो विज्ञापन एजेंसी देते हैं और जिला प्रभारी बना देते हैं ,और हर जगह प्रचार करते हैं वे जिला प्रभारी हैं।

मीडिया संस्थानो द्वारा  बंधुआ मजदूरी –

आम जनता के लिए लिखने वाला कलम का सिपाही  आजकल अपने लिए लिखने लग गया है,  इसकी प्रमुख वजह है – आजकल के कुछ मीडिया संस्थान हर पत्रकार से एक टारगेट के तहत काम करवाते है । ऐसे में पत्रकार  के पास कोई विकल्प नहीं बचता है , अपना रुतबा और नौकरी बचाने के लिए वह खबरें छुपाकर या दिखाकर  अपने संस्थान के लिए विज्ञापन निकलवाने का काम करता है।

खोजी पत्रकारिता और लोकतंत्र का चोली दामन का साथ है। पत्रकारिता के बिना लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। क्योंकि लोकतंत्र विचारों को निर्बाध रूप से बहने देकर उनसे नवीन आविष्कारों को जन्म देकर लोगों के वैचारिक और बौद्घिक स्तर को ऊंचा उठाने में सहायक शासन प्रणाली का नाम है। खोजी पत्रकारिता का आविष्कार इसीलिए हुआ कि पत्रकारिता जगत विचारों की हत्या न होने दे और न ही लोककल्याणकारी विचारों के सतत प्रवाह को रूकने दे।

पत्रकारिता पेशा नहीं, बल्कि समाजसेवा का मिशन है। किसी से प्रभावित होकर पत्रकारिता के दृष्टिकोण को नहीं बदलना चाहिए और खबर सच के साथ प्रकाशित करें। चुनौतियाँ कितनी भी हों, लेकिन इनके बीच से ही रास्ते निकालने होंगे।

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