म्हारो बरवाड़ो फाउंडेशन का अनूठा प्रयोग :थ्रो एंड ग्रो तकनीक से किया बीजारोपण

पहाड़ी क्षेत्रों में पौधारोपण करना बहुत कठिन है परंतु इस कार्य को सरल कर दिखाया चौथ का बरवाड़ा की सामाजिक संस्था म्हारो बरवाड़ो फाउंडेशन से जुड़े युवाओं ने | चौथ का बरवाड़ा में पहाड़ी क्षेत्र में सीड बॉल से बीजारोपण का यह प्रथम प्रयोग है। यह जानकारी देते हुए संस्था से जुड़े अनेन्द्र सिंह आमेरा ने बताया कि पहाड़ी क्षेत्रों में छायादार व फलदार वृक्ष लगाने के लिए युवाओं के टीम ने समीप के काला दाता वन क्षेत्र से विभिन्न छायादार वृक्षों से बीजों का संग्रहण किया साथ हो अन्य विकल्पों से बीज प्राप्त कर 7 दिन पूर्व मिटटी में देशी खाद मिलाकर विभिन्न छायादार वृक्षों के बीज रखकर 500 गेंदे बनाई। ऊपर से सूखने के बाद इनका रोपण करने हेतु अरावली पर्वतमाला की दुर्गम पहाड़ियों और रायसागर पार वाली पहाड़ियों को चुना है | शनिवार को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर सरपंच सीता देवी, वरिष्ठ अधिवक्ता अजय शेखर दवे, शिक्षाविद महेंद्र सिंह आमेरा सहित अनेन्द्र सिंह आमेरा, विमल सैनी, रमाकांत वर्मा, राहुल सैनी, शकील मंसूरी, रिंकू सैनी, विनोद सैनी, राजेश सैनी, गोपाल पारीक मनोज मिश्रा, सोनू धाकड़, अंकित शर्मा, योगेश माथुर, दिनेश जायसवाल, गिर्राज नागर, पप्पू सैनी, दिनेश वर्मा, नरेंद्र शर्मा, हेमराज सैनी, मयंक अग्रवाल आदि युवा इन सीड बॉलो को लेकर 30 कार्यकर्ता बीजासान माताजी क्षेत्र की पहाड़ियों पर पहुंचे, वहाँ गिलोल के माध्यम से इन बॉल को पहाड़ी क्षेत्रों में फेंका।

कितना सफल है यह प्रयोग – पर्यावरण प्रेमियों और कृषि विभाग के वैज्ञानिकों के अनुसार सीड बॉल का प्रयोग दुर्गम क्षेत्रो में वृक्षारोपण हेतु किया जाता है, और इसकी सफलता 70% तक रहती है, जहाँ खड्डा खोदकर पौधारोपण करके नियमित खाद जल ड़ालकर पौधे की सार संभाल नही की जा सकती वहाँ इस तरह थ्रो एंड ग्रो तकनीक द्वारा पौधारोपण किया जाता हैं।

कैसे प्रयोग करे सीड बॉल – उपजाऊ गीली मिटटी में उपयुक्त खाद मिलाकर 2 दिन तक खाद अच्छी तरह मिल जाने के बाद मध्य में बीज रखकर इसकी गेंद बनाई जाती हैं, इसे 5-6दिन तक सुखाई जाती है ताकि फेंकने में सुविधा रहे, इस दौरान गेंद अंदर से नम रहती है और बीज प्रस्फुटित हो जाता है, वर्षा काल में इसे पहाड़ी क्षेत्रों में इसे फेंकते है, तब यह अपना स्थान खुद बनाकर मिटटी के सम्पर्क में आते ही पौधा बढ़ने लगता है। पहाड़ी क्षेत्रों में जानवरो से इनकी सुरक्षा की आवश्यकता नही होती साथ ही यह पौधा स्वयं संघर्ष करके फलता फूलता है।

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