साहित्य की दशा-दिशा लेखक नहीं बल्कि पाठकों का दृष्टिकोण तय करता है : कुलपति

दरभंगा : विश्वविद्यालय मैथिली विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा एवं वैदेही फाॅउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में ‘ मैथिली उपन्यासक दशा ओ दिशा’ विषयक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित हुआ। उद्घाटन सत्र में मंचासीन अतिथियों का स्वागत मिथिला परंपरानुसार पाग-चादर से सम्मानित किया गया तथा उनके द्वारा दीप प्रज्ज्वलन से कार्यक्रम का उद्घाटन किया गया।

मंगलाचरण सुषमा कुमारी के ‘जय-जय भैरवि’ गायन एवं दीपक कुमार झा, कन्हैया कुमार के वादन से हुआ। इस अवसर पर स्वागत गीत दीपक कुमार झा ‘पाहुन अयला दुआरि हे, स्वागत करु बहिना’ गाकर अतिथियों का स्वागत किया। स्वागत वक्तव्य सेमिनार आयोजन के सचिव प्रोफेसर नारायण झा ने दिया।

कार्यक्रम में अतिथियों के स्वागत के पश्चात् डॉ० फूलो पासवान द्वारा रचित पुस्तक ‘प्रभाषक कथाकृतिमे समाज-दर्शन’ को लोकार्पित किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति ने कहा कि विश्वविद्यालय परिसर में सेमिनारों की निरंतरता सकारात्मक सोच एवं यहां की स्वस्थ शैक्षणिक परंपरा को प्रमाणित करता है। यह आवश्यक भी है। किसी भी भाषा साहित्य की दशा-दिशा को लेखक नहीं, बल्कि पाठक एवं समीक्षक तय करते हैं। कुलसचिव प्रो मुश्ताक अहमद ने इस बावत कहा कि मैथिली भाषा में लिखित साहित्य का प्रमाण तेरहवीं शताब्दी से ही प्राप्त होता है, इससे स्पष्ट है कि मैथिली भाषिक और साहित्यिक दृष्टिकोण से अत्यंत समृद्धशाली और व्यापक है।

किसी भी साहित्य में गागर को सागर बनाने का काम उपन्यास ही करता है। इससे पूर्व बीज भाषण देते हुए प्रोफेसर रमण झा ने कहा कि मैथिली उपन्यास का आरंभ बीसवीं शताब्दी से आरंभ हुआ।यह गद्य विधा का महाकाव्य है। कहा जाता है कि यह अंग्रेजी साहित्य की देन है, लेकिन भारतीय साहित्य परंपरा में रचित दीर्घ कथा को आधुनिक उपन्यास का बीज रूप माना जा सकता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए मैथिली विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर रमेश झा ने मैथिली उपन्यास के विषय विविधता को रेखांकित करते हुए इसे कोशिका की अविरल धारा जैसा बताया। मैथिली उपन्यास वर्तमान समय में सर्वाधिक लोकप्रिय विधा बन गया है। वैदेही फाॅउंडेशन के अध्यक्ष प्रोफेसर सरोज चौधरी ने इस अवसर पर फाॅउंडेशन के क्रियाकलापों को संक्षेप में रखते हुए इसे सार्वजनिक धर्मार्थ से जोड़ा। फाॅउंडेशन के माध्यम से मिथिला में शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक परंपरा के विकास में अप्रतिम योगदान की बात कही। कार्यक्रम का मंच संचालन डॉ अशोक कुमार मेहता एवं अंत में वैदेही फाॅउंडेशन के महासचिव डॉ० गोपाल चौधरी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

सेमिनार के दूसरे अर्थात् तकनीकी सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रोफेसर भीमनाथ झा ने मैथिली उपन्यास के दशा और दिशा का व्यापक विश्लेषण किया। इस क्रम में उन्होंने औपन्यासिक गरिमा को बचाने एवं इसे और अधिक सामाजिक जीवन दृष्टि से परिपूरित करने की वकालत की। इस सत्र में विशिष्ट अतिथि के रूप में अजित आजाद और मुख्य वक्ता के रूप में नेपाल से आये प्रोफेसर परमेश्वर कापड़ि और रौशन जनकपुरी ने भी मैथिली औपन्यासिक दशा-दिशा के संदर्भ में विस्तार से अपनी बातें रखीं।

इस अवसर पर उक्त के अलावा विष्णु प्रसाद मंडल, डॉ सुनीता झा, डॉ सत्येन्द्र कुमार झा, डॉ रौशनी, डॉ आदित्यनाथ झा, डॉ श्यामानंद शांडिल्य, प्रो रामकलित झा, प्रो प्रमोद कुमार पासवान, षष्ठी अंशुमान, राजनाथ पंडित, शिवम कुमार झा, डॉ मनोज कुमार कुमर, डॉ शैलेन्द्र मोहन मिश्र, मोहन मुरारी झा, डॉ सुनीता कुमारी, डॉ दुर्गानंद ठाकुर, प्रवीण कुमार झा द्वारा आलेख वाचन किया गया। इस अवसर पर डॉ अजीत मिश्र, डॉ सुरेन्द्र भारद्वाज, डॉ अरविन्द कुमार सिंह झा, डॉ अरुण कुमार ठाकुर, वैदेही फाॅउंडेशन से केशवेन्द्र चौधरी, डॉ धीरेन्द्र नाथ मिश्र, कमलाकांत झा, डॉ नरेन्द्र नाथ झा, डॉ रागिनी रंजन, डॉ अभिलाषा, डॉ पंकज कुमार, डॉ प्रीति झा, डॉ जीतेन्द्र नारायण, डॉ मुनेश्वर यादव, डॉ चन्द्रभानु सिंह, डॉ ए के बच्चन, डॉ जीया हैदर, रौशन कुमार, सत्यनारायण प्रसाद यादव, दीपक कुमार, हरेराम पंडित, निशु कुमारी, कौशल कुमार, कंचना झा, मार्तण्ड रत्नम, पुनम झा, डॉ अरविन्द झा, अजीत झा आदि उपस्थित थे। तकनीकी सत्र का संचालन डॉ नारायण झा ने किया।

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